Chapter-1-1
मैंने पहली कक्षा तक गांव के ही निजी स्कूल में पढ़ाई की बडा़ भाई तीसरी कक्षा में था।ग़रीबी की वजह से पढ़ाई छुड़ाकर अपने साथ पंजाब ले गए साल-दो साल वापस नहीं आए तो पीछे से कच्चा घर ढह गया जो आज तक भी नहीं बन पाया।
भाई की तीसरी की पढ़ाई छुडा़ कर चाय की दुकान पर कप प्लेट धोने में लगा दिया ।जिससे कुछ सहायता मिले।उसके बाद गांव में घर ढह जाने की वजह से गांव छोड़कर दूसरे कस्बे में 100किराये पर रहना पडा़।इस कस्बे में एक निजी स्कूल जो की पास ही था करवा दिया पहली कक्षा पढ़े हुए को सीधे ही पांचवीं में ।किराए का एक कमरा था कमरे में बिजली की व्यवस्था नहीं थी चिमनी थी वो भी जब तक तब मैंने बीए किया ।भाई को दुकान वाला ज़्यादा काम लेता था सुबह चार बजे से रात ग्यारह बजे तक इस वजह से मां ने छ महीने में ही वापस बुला लिया।भाई को ट्रक रिपेयर सीखने में लगा दिया
कुछ एक सालों के बाद ग़रीबी और ईसाई समुदाय के प्रभाव में आकर भाई ने उनके लिए हमें छोडकर उनके साथ रहने का निर्णय लिया। पिताजी ने भी खर्चा ना उठा पाने की वजह से इजाज़त दे दी।वो उनके साथ जीवनमें आगे बढ़ रहाहै
पांचवी से आठवीं तक निजी विद्यालय में पढ़ा जहां एक पढ़ाई कम धुलाई ज़यादा होती थी ।आठवीं तक तो जंगल में अपनी दो बकरियों को आधे दिन मां और स्कूल से आकर मैं चराता था ।मां कभी कभी पांच छः किलोमीटर जंगल से अन्य औरतों के साथ लकड़ी लाती थी मैं उनको लिवाने जाता था।कक्षा 10 में आते आते माताजी की सेहत ख़राब रहने लगी ज़्यादातर खाना मैं ही बनाता था कभी कभी तो मां के कपडें भी धोता था।
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