Chapter-1-2
आठवीं बोर्ड कक्षा 68% से पास करली । दसवीं में हार्मोनल मजबूरी से एक तरफ़ा प्यार में पड़कर दिमाग़ ज्यादा पढ़ाई में नहीं लगा और 48.83% बिना किसी ट्यूशन (अंग्रेजी का एक डेढ़ महीना उसके पैसे भी दे नहीं पाया)से पास की।
अंग्रेजी आती नहीं थी और 54 मार्क्स थे लेकिन वैल्यु पता थी इसलिए अंग्रेजी साहित्य पढ़ने की ठानी की ज़्यादा नहीं कुछ कर पाया तो कम से कम ट्यूशन पढ़ाकर ही खर्चा निकाल लूंगा और इज्ज्त भी ज्यादा मिलेगी। दुनिया में अंग्रेजी बढ़ रही है यही सोच अपने सरकारी स्कूल से टीसी कटवा ली और दर दर की ठोकरें खाता रहा की कहीं अंग्रेजी साहित्य मिले लेकिन कहीं नहीं मिली और जहां मिली वहां मेरी कम पर्सेंट की वजह से प्रवेश नहीं मिला और कहीं रहने की व्यवस्था या सरकारी होस्टल नहीं था।हार थक कर वापस अपने ही सरकारी स्कूल में वापस आना पडा़ वहां मुझे भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान मेरे टीचर्स ने अपने स्वार्थ के लिए दिला दिया क्योंकि विज्ञान संकाय में छात्रों की संख्या न्यून थी।बिना ट्यूशन किसी तरह से अनिवार्य हिन्दी की रहमो-करम से कक्षा बारहवीं 54.15 % से पास कर लिया।घर में मां के काम में भी हाथ बंटाता था क्योंकि उनकी तबियत कभी ज़्यादा तो कभी कम रहती। पिताजी आजीविका के लिए पंजाब -हरियाणा की तरफ ही रहते महीने तक महीने में ही आते थे। मैं और मां ही रहते थे।गर्मियों की छुट्टियों में मैं भी भाई के द्वारा गुड़गांवा काम के लिए बुलाने पर काम के लिए जाना पडा़ भाई ईसाई मिशनरियों के साथ रहता था।
ग्याहरवी कक्षा के दोरान कम्प्यूटर हार्डवेयर सीखने की ठानी की फीस महंगी थी पर एक बार सीख गया तो पैसे ही पैसे और इज्जत भी मां पिताजी को किसी तरह फायदे गिनागुनुकर राज़ी किया फीस 500 हर महीने और पिताजी की कमाई 2000=2500...
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