Chapter-1-3
आर्थिक तंगी की वजह तीन चार महीने ही सीख पाया और उसमें भी आधे से ज़्यादा समय गेम खेलने में और कम्प्यूटर पर फिल्म देखने में खर्च कर दिया क्योंकि कोचिंग मालिक भी नहीं चाहता था की हम जल्दी सीखें एक महीने जितना सीखना था चार महीने लग गए।
12 के बाद गर्मियों की छुट्टियों में काम के सिलसिले में मां को150 बिना बिजली वाले किराये के घर में अकेले छोड़कर गुड़गांवा जाना पडा़।यह समय ऐसा था जब परिवार के चारों सदस्य अलग अलग रहना शुरू करना पडा़। कई इंटरव्यू दिये कोई काम फ्रेशर होने की वजह से नहीं मिला अंत में पिआन की नौकरी मिली तनख्वाह 1800 उसमें गुड़गांवा में कमरा किरया भी देना और खुद का खर्चा और घर भी भेजना। छुट्टियां खत्म हुई घर आया अब कोलिज में एडमिशन लेना था इसलिए रेगूलर विद्यार्थि के रूप में जिले के कोलेज में लाइन लगाकर दो दो घण्टे फार्म जमा करवाए सेकिणड वेटिंग लिस्ट में नियमित विद्यार्थी के रूप में प्रवेश मिल गया विषय अंग्रेजी, सामाजिक शास्त्र, राजनीति शास्त्र। नियमित इस लिए लेना मजबूरी की छात्रवृत्ति मिलेगी वह खर्च में काम आएगी और कोलेज का कुछ ज्ञान भी मिल जाएगा क्योंकि सुन रखा था नो नोलेज विदाउट कोलेज।अब रोजा़ना घर से 100किलो मीटर आना जाना संभव नहीं था इसलिए दो और साथियों के साथ पांच किलोमीटर दूर कमरे किराए लेना पड़ा किराया 800रू ।
इस कमरे कमरे के प्लास्टर भी नहीं था और लोहे की चद्दर का दरवाज़ा था हां यहां बिजली थी। पांचवी से बाहरवी तक रात का ज़्यादातर रात का समय दूसरों के घर ही गुजरता था मां पिताजी को बोल देता था कि मुझे पढ़ना है अपने घर में तो लाइट भी नहीं है इसलिए मैं फलाने के घर
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