Chapter-1
मेरा नाम है Pirnu
राजस्थान में अलवर ज़िले में थानागाज़ी तहसील के किसी छोटे से गांव में जन्म कच्चे झोपड़े में पैदा हुआ।माता पिताजी अनपढ़ मकानों की टीप मज़दूरी करते थे।बचपन से ही अत्यंत ग़रीबी में गुज़ारे।माताजी गृहणी थी। पिताजी अत्यंत सरल और सीधे थे।सीधे इतने की बच्चे भी उनसे अपना काम निकलवा लेते थे। मज़दूरी करते थे तो कई ठेकेदार काम करवाने के बाद हिसाब के पैसे समय पर नहीं देते थे और देते थे तो वो भी बिना बात के ख़रचा ज़्यादा दिखा देते थे (बीड़ी,दारू,मीट)।वो किसी से ज़्यादा बहस नहीं करते थे ।जो मिलता वो ले लेते और हमें हाथ खर्च भेज देते।उनके हाथों में सीमेंट से एलर्जी थी काम करते समय उनके हाथों से मवाद तो कभी कभी ख़ून भी चू जाते थे।वो मजबूरी में ये काम ही करते थे क्योंकि वो दूसरा काम जानते ही नहीं थे।और उनके मित्रगण इस तरह के काम में ही थे सो वे यही पसंद करते थे।महीने में दस दिन ही सही से काम कर पाते थे बाकी के समय इलाज में।माता जी काया से दुबली पतली थी इसलिए भारी काम न कर पाती थी कभी जंगल से लकड़ी ईंधन ले आती थी और पिताजी माताजी को काम पर भेजते भी नहीं थे।तीन किलोमीटर से पीने का पानी लाती थी ।बचपन में ही मैं भी बिमारियों से ग्रस्त रहा बचपन में मेरे इलाज के लिए अपने पैरों के कड़े और गले का पैंडेंट जो कि गिरवी रखने के मात्र साधन थे रख दिए थे मात्र 2000 में।
ग़रीबी में इलाज ना करवा पाने की वजह से बहन का निमोनिया से 2साल की उम्र में मृत्यु हो गई पिताजी को पत्र लिखवाया जो 1 महीने में मिला।पढ़ाई:ग़रीबी की वजह से पिताजी के साथ माता जी...
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