Chapter 2-5

 दो -चार दिन गुज़र गए।एक दिन हम कमरे पर पढ़ाई कर रहे थे की अचानक ही अवि के पापा आए आदर सम्मान कर के बाद उन्होने मोबाइल यह कहते हुए मेरे हाथ में दिया कि अवि तुझसे मज़ाक कर रहा था वो चाहता था की तू उसका ड्राइंग की फाइल बनाएगा तब वह लौटा देगा।मैंने ख़ुशी और धन्यवाद के साथ वो ले लिया मैं  मन ही  मन में जनता था की वो अपने लड़के का बचाव चतुराई से कर रहे थे जबकि सारी कहानी से वो वाक़िफ़ ही नहीं थे।

 बीए फाइनल के दौरान मेरी माताजी कई बार बीमार पड़ीं । जब तक दवाई चलती जब तक वो ठीक रहती और फिर वो  थोड़े दिन बाद बीमार पड़ जाती ।मैं उनको सरकारी अस्पताल में लेकर जाता था लेकिन सरकारी अस्पताल में डाक्टर  दवाई बाहर की लिखते जो ₹150-500  की होती जो की मैं वहन नहीं कर पाता क्योंकि पिताजी पैसे समय पर नहीं भेज पाते और जो आते वो पुराने कर्जे को चुकाने में चले जाते।एक बार मैं बहुत परेशान था मेरे पास पैसे नहीं थे और मां बार बार बीमार हो जाती थी।मैं एकांत समय में डाक्टर से मिलने की प्लानिंग की शायद डाक्टर कोई मदद करें और दवाई अंदर की ही लिख दे। मैंने शाम का समय चुना जब डाक्टर अपने सरकारी  कमरे में अकेला था।मैंने खिड़की से डाक्टर को पुकारा वो खिड़की में आया मैंने अपनी शुरुआत आर्थिक व माली हालत का ब्यान करने लगा  कि हमारे कच्चे घर थे हम प्रदेश चले गए और पीछे से हमारे घर ढह गया वगैरा वगैरा लेकिन डाक्टर मेरी हालत जानने का इच्छुक नहीं था बोला सीधा सीधा बोल ये राम कथा मुझे नहीं सुननी मैंने दबे दिल से  प्रार्थना की हम बहुत ग़रीब हैं अगर आप दवाई    अन्दर से दिला दे उसने बोला की मैं सिर्फ ग्लुकोज़ की बोतल ही अंदर से दे सकता हूं बाकी बाहर से लेना पड़ेगा।मेरा दिल बैठ गया।अपना सा मुंह लेकर लौट आया।अब‌ निश्चय किया की किसी से पैसे लेकर मां की जांच करवानी है जिससे समस्या का पता चले ।अलवर ले गया बडे़ अस्पताल में ले गया वहां मां के पेट की जांच हुई भर्ती कर लिया गया इलाज चला‌ और रिपोर्ट भी आ‌ गई जांच में ख़ुन  की और पथरी आई मैंने मेरे किसी भी रिश्तेदार को भाई को या पिताजी को सूचना नहीं की की वो चिंता करेंगे और अपने काम को छोड़कर मिलने आएंगे उनको‌ नुकसान होगा ।सात आठ दिन इलाज चला मां को आराम आया तो छुट्टी मिल गई इस इलाज के दौरान अस्पताल में मां के साथ होने की वजह से ना ही तो आईएएस का एग्जाम दे पाया और ना ही होली मना पाया। छुट्टी मिली घर आ गए अब मकान मालकिन को लगने लगा की मेरी मां बीमार रहने लगी है और वह मर भी सकती है तो वह किराया जमा करने के लिए दबाव बनाने लगी जिसको की हम साल भर से नहीं चुका पाए थे डूबने का खतरा मंडरा रहा था।मेरी मां थोड़े दिन तो ठीक रही और फिर बीमार पड़ गई ।मकान मालकिन को पता था की बीमारी का पता था फिर भी बार बार किराया मांगने के लिए आ जाती मेरी मां उसके तकादे से टैंशन की वजह से ज़्यादा बीमार पड़ जाती। मां को फिर से अलवर ले गया फिर भर्ती करवाया फिर सात आठ दिन भर्ती रही ठीक होकर घर आई।महीने भर बाद फिर बीमार पड़ने पर मैं अलवर ले गया और इस बार डाक्टर ने दिल की जांच लिखी मैंने जांच बाहर से करवाई । रिपोर्ट दिल बैठ जाने वाली‌ थी हाट के वाल्व ख़राब हो गए थे मैंने भाई को बताया उसने कहा एक बार दिल्ली ले आ यहां मेरे मिलने वाले डाक्टर को दिखाते हैं ।वहां मां को ले गया तो डाक्टरस ने दुबारा चैक किया और भाई को बताया की ज़्यादा से ज़्यादा छ महीने ही जी पायेंगी। भाई ने मुझे समझाया की अब हमें सेवा करनी है और दुआ करनी है मैं बहुत दुखी था मेरी मां ज़िंदा लाश मेरे साथ थी ।

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