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Showing posts from April, 2021

Chapter-2-3

 ठीक है उन्होंने कहा।इसके कुछ दिनों बाद मेरा  दोस्त मेरे घर आया मुझसे कहने लगा अलवर चलेगा क्या मैंने बोला मां की तबीयत ख़राब है  कुछ कह नहीं सकता हूं।वो चला गया ।उसके जाने के घण्टे दो घण्टे बाद ही मैं भी अलवर पहुंच गया। मैं जैसे ही पहुंचा तो मैंने देखा तो मेरे रुममेट मेरा मामा वाला मोबाइल ढूंढ रहे थे  एक दोस्त कह रहा था मैंने यहां रखा था इतने में मेरा गांव वाला मित्र अवी भी आ गया वह लैट्रिन गया हुआ था दूसरा कह रहा था मैं दूध की थैली लिए आ गया था बोला तू तो कल आने वाला था अवी ने पूछा।मैंने बोला मां ने भेज दिया छुट्टी नहीं करनी । अभी तो मोबाइल इसके पास था इतनी ही देर में कहां गया?पलंग के नीचे देखो । मैं फो़न लगाकर देखता हूं ।फोन तो कह रहा है जिससे आप कोल कर रहे हो वहां पहुंच संभव नहीं है।  अवि कहता है कोई उठा तो नहीं गया? पहले नम्बर बंद करवाओ कहीं कोई काण्ड कर दे और तुम फंस जाओ चलो कस्टमर केयर। मेरे दोनों रूममेट और मैं घबराहट में थे ।हम पैदल ही कस्टमर केयर पर गये । मोबाइल को ढूंढने के लिए पुलिस में एफआईआर करवानी पड़ेगी मेरे रूममेट ने कहा मेरा एक मिलने वाला कांस्टे...

Chapter-2-2

 हम जैसों को कुछ समझता ही नहीं था। कोलेज के फ्रसट ईयर के दौरान उससे मुलाक़ात हुई मैं फलां फलां कोलेज में हूं बी फार्मा कर रहा हूं ।मैंने अपने बारे में बता दिया।फिर बोला तेरे फोन नम्बर दे मैंने बोला मेरे मामा का फोन है पर मेरे पास सिम नहीं वो बोला मैं नया सिम दिला दूंगा।मैंने बोला मेरे दोस्त ने सिम ले रखी है ।फोन घर पर मुझे चलाना नहीं आता ।वह बोला मैं सिखा दूंगा चल। मेरे घर आ गया और बोला देख ऐसे खोलते हैं ये गुडिया खराबी नहीं मैं वोलपेपर है । यहां सिम लगती है।वह मेरी मां से भी मिला प्रणाम किया बोला घनश्याम अच्छा लड़का है इसने मुझे बताया नहीं की आप इतने ग़रीब हो नहीं तो पापा को बोलकर इसके अच्छे नम्बर भिजवाता कोई बात नहीं कभी ज़रूरत हो तो बताना मुझे अपना ही समझो।और वो चला गया।कई एक दिनों बाद उसके बाप  फोन आया बोला मैं उसका पापा बोले रहा हूं तुम कहां हो मैं कमरे पर हूं । उन्होंने मुझे एक चौराहे पर बुलाया और बाइक पर बिठाकर कहीं ले गए बोले तुझे मेरे बेटे ने कोई मोबाइल दिलाया है क्या मैंने बताया की मेरे पास मेरे मामा का फोन है और उसका बिल भी है।

Chapter-2-1

 दूसरे दोस्त ने फोन छीनकर काट दिया हम तो सोच रहे थे तुम यूं ही फोन लगाकर बात करने का बहाना कर रहा है और तूने सच में कोल लगा दिया।उसने बोला हंसते हुए कहा मैं किसी से डरता नहीं ।मैं तेरी शादी इसी से करवाऊंगा।अब आगे क्या हुआ पता नहीं आज 15साल हो गए।  मेरे बड़े मामा ने नया फ़ोन ख़रीदा था नोकिया 3310 उन्हें चलाना नहीं आता बार बार स्क्रीन पर एक गुड़िया सी आ जाती ।हम सब सोचते इस फ़ोन में कुछ गडबड है ।मामा भी समझ नहीं पाते थे।वो उससे परेशान थे उस दौर में किसी के फ़ोन भी नहीं आते थे यूंही पड़ा रहता था उनकी जेब में और उनको चलाना भी नहीं आता था दूसरी स्क्रीन पर वो गुडिया आ जाती थी।मेरे मामा से मैंने कहा कुछ समय मुझे दे दो मैं सीखता हूं और फिर आपको सिखा दूंगा तब आप रख लेना ।मामा राज़ी हो गए मैं उसको लेकर शहर चला गया। जहां मैंने कमरा ले रखा था। मेरे दो और दोस्त मेरे साथ रहते थे । वो बोले इसमें नई सिम हम डलवा लेते हैं हमने सिम डलवा ली और कभी वो अपने रिश्तेदारों को तो कभी अपने दोस्तों को फोन करते।मेरे तो किसी रिश्तेदार के पास फोन था नहीं तो मैं तो उनकी बातें ही सुनता एक दिन मेरा स्कूल का ए...

Chapter-1-5

 मैंने बारहवीं पास की और ज़िले के बडे़ सरकारी कोलेज में एडमिशन लिया।उसी कोलेज के पहले ही दिन मेरा एक पांचवी कक्षा में साथ पढ़ा हुआ आठ साल बाद मिला ।वह अपने दोस्तों के साथ था।वह पैसे वाला था और वैसे ही उसके दोस्त लग रहे थे ।मैं उससे मुलाक़ात करना चाह रहा था किन्तु हिचकिचा रहा था उसी दिन  दो चार बार आमना सामना हुआ लेकिन वह शायद पहचान नहीं पाया ।मैं कैम्पस की एक सीट पर जाकर बैठ गया।वह भी अपने दोस्तों से अलग होकर मेरी बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया।शायद उसने हल्का सा पहचान लिया था पर उसने मुझसे बात नहीं की। शुरुआत मैंने ही की क्या वह मेरे गांव में कभी गया था पांचवी में पढ़ता था?उसने कहा हां फिर मैंने कहा  तुम्हारा नाम ऋषि है?उसने कहा हां,मुझे पहचाना ..तुम वही हो जिसके एक हाथ में दो अंगूठे हैं इतना कहते ही दोनों हंसने लगे और गले लगा लिया शायद उसे मेरा नाम याद नहीं था।  वो उससे आखिरी मुलाकात थी आजतक दुबारा मिलान नहीं हुआ ।वहीं एक नया दोस्त मिला जो की मेरे ही‌ विषय का था तुषार। एक दिन मैं यूं ही‌ बैठा था वह अपने दोस्तों के साथ अपने ही एक दोस्त का फोन लेकर किसी लड़की के भाई के ...

Chapter -1-4

 पढ़ने जा रहा हूं अगर लेट हो गया तो वहीं सोऊंगा।वहां जाने के बाद ना तो बच्चों के शोर शराबे और मस्ती में ना तो पढ़ाई हो पाती और ना ही सो पाता दूसरा केमिकल लोचा जो उनके घर में टीवी देखने को मजबूर करता कभी ये फिल्म कभी वो फिल्म कभी अलिफ लैला कभी शक्तिमान कभी चंद्रकांता ।पढ़ाई गई तेल लेने। और रात को टीवी बन्द होने के बाद वही कूकर्म जो अमूमन सभी दोस्त आपस में करते हैं । हमारे मिलने वाले मोहन जी जो की मेरे पिताजी के मित्र , ठेकेदार और हमारे पहले मकान मालिक थे वो कहते थे की मुझमें कुछ विलक्षण प्रतिभा थी और इसको पढाऔ ये कुछ ज़ऱूर करेगा। पिताजी को समझाकर पढा़ने को राज़ी कर लिया जिस वहज से मुझे दूसरी कक्षा के बजाय सीधे ही पांचवी में जबकि मेरी पढ़ाई की उम्र के हिसाब से मुझे तीसरी में होना चाहिए था।स्कूल ने मेरे साधारण टैस्ट लिया और पांचवी में प्रवेश दे दिया । पांचवी और छठी कक्षा में था तो पड़ोस का एक मकान छोड़कर दूसरे मकान में बैंक का कैशियर रहता था उसके घर रंगीन टीवी था और उसके तीन लड़कियां थी जो की मुझसे जूनियर थी मैं उनमें से बीच वाली को पढ़ाता था जो की छत से गिरने की वजह से दोनों पैर टू...

Chapter-1-3

  आर्थिक तंगी की वजह तीन चार महीने ही सीख पाया  और उसमें भी आधे से ज़्यादा समय गेम खेलने में और कम्प्यूटर पर फिल्म देखने में खर्च कर दिया क्योंकि कोचिंग मालिक भी नहीं चाहता था की हम जल्दी सीखें एक महीने जितना सीखना था चार महीने लग गए। 12 के बाद गर्मियों की छुट्टियों में काम के सिलसिले में मां को150 बिना बिजली वाले किराये के घर  में अकेले छोड़कर गुड़गांवा जाना पडा़।यह समय ऐसा था जब परिवार के चारों सदस्य अलग अलग रहना शुरू करना पडा़।  कई इंटरव्यू दिये कोई काम फ्रेशर होने की वजह से नहीं मिला अंत में पिआन की नौकरी मिली तनख्वाह 1800 उसमें गुड़गांवा में कमरा किरया भी देना और खुद का खर्चा और घर भी भेजना। छुट्टियां खत्म हुई घर आया अब कोलिज में एडमिशन लेना था इसलिए रेगूलर विद्यार्थि के रूप में जिले के कोलेज में लाइन लगाकर दो दो घण्टे फार्म जमा करवाए सेकिणड वेटिंग लिस्ट में नियमित विद्यार्थी के रूप में प्रवेश मिल गया विषय अंग्रेजी, सामाजिक शास्त्र, राजनीति शास्त्र। नियमित इस लिए लेना मजबूरी की छात्रवृत्ति मिलेगी वह खर्च में काम आएगी और कोलेज का कुछ ज्ञान भी मिल जाएगा क्योंकि सु...

Chapter-1-2

 आठवीं बोर्ड कक्षा 68% से पास करली । दसवीं में हार्मोनल मजबूरी से एक तरफ़ा प्यार में पड़कर दिमाग़ ज्यादा पढ़ाई में नहीं लगा और 48.83%  बिना किसी‌ ट्यूशन (अंग्रेजी का एक डेढ़ महीना उसके पैसे भी दे नहीं पाया)से पास की। अंग्रेजी आती नहीं थी और 54 मार्क्स थे लेकिन वैल्यु पता थी इसलिए अंग्रेजी साहित्य पढ़ने की ठानी की ज़्यादा नहीं कुछ कर पाया तो कम से कम ट्यूशन पढ़ाकर ही खर्चा निकाल लूंगा और इज्ज्त भी ज्यादा मिलेगी। दुनिया में अंग्रेजी बढ़ रही है यही सोच अपने सरकारी स्कूल से टीसी कटवा ली और दर दर की ठोकरें खाता रहा की कहीं अंग्रेजी साहित्य मिले लेकिन कहीं नहीं मिली और जहां मिली वहां मेरी कम पर्सेंट ‌की वजह से प्रवेश नहीं मिला और कहीं रहने की व्यवस्था या सरकारी होस्टल नहीं था।हार थक कर वापस अपने ही‌ सरकारी स्कूल में वापस आना पडा़‌ वहां मुझे भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान मेरे टीचर्स ने अपने स्वार्थ के लिए दिला दिया क्योंकि विज्ञान संकाय में छात्रों की संख्या न्यून थी।बिना ट्यूशन किसी तरह से अनिवार्य हिन्दी की रहमो-करम  से कक्षा बारहवीं 54.15 % से पास कर लिया।घर में मा...

Chapter-1-1

 मैंने पहली कक्षा तक गांव के ही निजी स्कूल में पढ़ाई की बडा़ भाई तीसरी कक्षा में था।ग़रीबी की वजह से पढ़ाई छुड़ाकर अपने साथ पंजाब ले गए साल-दो साल वापस नहीं आए तो पीछे से कच्चा घर ढह गया जो आज तक भी नहीं बन पाया। भाई की तीसरी की पढ़ाई छुडा़ कर चाय की दुकान पर कप प्लेट धोने में लगा दिया ।जिससे कुछ सहायता मिले।उसके बाद गांव में घर ढह जाने की वजह से गांव छोड़कर दूसरे कस्बे में  100किराये पर रहना पडा़।इस कस्बे में एक निजी स्कूल जो की पास ही था करवा दिया पहली कक्षा पढ़े हुए को सीधे ही‌ पांचवीं में ।किराए का एक कमरा था कमरे में बिजली की व्यवस्था नहीं थी चिमनी थी वो भी जब तक तब मैंने बीए किया ।भाई को दुकान वाला ज़्यादा काम लेता था सुबह चार बजे से रात ग्यारह बजे तक इस वजह से मां ने छ महीने में ही वापस बुला लिया।भाई को ट्रक रिपेयर सीखने में लगा दिया कुछ एक सालों के बाद‌ ग़रीबी और ईसाई समुदाय के प्रभाव में आकर भाई ने उनके लिए हमें‌ छोडकर उनके साथ रहने का‌ निर्णय लिया। पिताजी ने भी खर्चा ना उठा पाने की वजह से इजाज़त दे दी।वो उनके साथ जीवन‌में आगे बढ़ रहा‌है पांचवी से आठवीं तक निजी विद्या...

Chapter-1

 मेरा नाम है Pirnu राजस्थान में अलवर ज़िले में थानागाज़ी तहसील के किसी छोटे से गांव में जन्म कच्चे झोपड़े में पैदा हुआ।माता पिताजी अनपढ़ मकानों की टीप मज़दूरी करते थे।बचपन से ही अत्यंत ग़रीबी में गुज़ारे।माताजी गृहणी थी। पिताजी अत्यंत सरल और सीधे थे।सीधे इतने की बच्चे भी उनसे अपना काम निकलवा लेते थे। मज़दूरी करते थे तो कई ठेकेदार काम करवाने के बाद हिसाब के पैसे समय पर नहीं देते थे और देते थे तो वो भी बिना बात के ख़रचा ज़्यादा दिखा देते थे (बीड़ी,दारू,मीट)।वो किसी से ज़्यादा बहस नहीं करते थे ।जो मिलता वो ले लेते और हमें हाथ खर्च भेज देते।उनके हाथों में सीमेंट से एलर्जी थी काम करते समय उनके हाथों से मवाद तो कभी कभी ख़ून भी चू जाते थे।वो मजबूरी में ये काम ही करते थे क्योंकि वो दूसरा काम जानते ही नहीं थे।और उनके मित्रगण इस तरह के काम में ही थे सो वे यही पसंद करते थे।महीने में दस दिन ही सही से काम कर पाते थे बाकी के समय इलाज में।माता जी काया से दुबली पतली थी इसलिए भारी काम न कर पाती थी कभी जंगल से लकड़ी ईंधन ले आती थी और पिताजी माताजी को काम पर भेजते भी नहीं थे।तीन किलोमीटर से पीने का प...